मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा | अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् || ३३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदकिम्
क्या
पुनः
फिर
ब्राह्मणाः
ब्राह्मण
पुण्याः
पुण्यात्मा
भक्ताः
भक्त
राजर्षयः
राजर्षि
तथा
तथा
अनित्यम्
अनित्य
असुखम्
दुःखमय
लोकम्
लोक
इमम्
इस
प्राप्य
पाकर
भजस्व
भज
माम्
मुझे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तो फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण और भक्त राजर्षि तो कहना ही क्या? इस अनित्य और दुःखमय संसार को प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यदि नीच योनि के लोग भी भगवान को प्राप्त हो जाते हैं, तो फिर ब्राह्मण और राजर्षि जैसे उच्च अधिकारियों के लिए तो यह और भी सरल है। अतः अर्जुन को भी भजन करना चाहिए।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
फिर पुण्यात्मा ब्राह्मण और भक्त राजर्षियों की तो बात ही क्या? इस अनित्य और दुःखमय संसार को प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
मानव-जीवन दुर्लभ और क्षणभंगुर है। इसे पाकर सबसे उत्तम कार्य है भगवान की भक्ति करना। यही जीवन की सार्थकता है।