मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु | मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः || ३४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदमत्-मनाः
मुझमें मन लगाने वाला
भव
हो
मत्-भक्तः
मेरा भक्त
मत्-याजी
मेरा पूजन करने वाला
माम्
मुझे
नमः कुरु
नमस्कार कर
माम्
मुझे
एव
ही
एष्यसि
प्राप्त होगा
युक्त्वा
युक्त होकर
एवम्
इस प्रकार
आत्मानम्
अपने आपको
मत्-परायणः
मुझ परायण होकर।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मुझमें मन लगा, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन कर, मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार मुझमें ही आत्म-भाव को लगाकर, मुझ परायण होकर तू मुझे ही प्राप्त होगा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अध्याय ९ का निगमन है। भगवान अर्जुन को भक्ति के पाँच अंग बताते हैं – मनःसमर्पण, भक्ति, पूजा, नमस्कार, और परायणता। इससे सीधे भगवत्प्राप्ति होती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मुझमें मन लगाने वाला बन, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला बन, मुझे नमस्कार कर। इस प्रकार अपने आपको मुझमें युक्त करके, मुझ परायण होकर तू मुझे ही प्राप्त होगा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति का सरलतम सूत्र – मन, कर्म, भाव, और नम्रता से भगवान को समर्पित हो जाओ। यही मोक्ष का राजमार्ग है।