श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 23

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 136 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
ये
जो
अपि
भी
अन्य-देवताः
अन्य देवताओं के
भक्ताः
भक्त
यजन्ते
पूजा करते हैं
श्रद्धया
श्रद्धा से
अन्विताः
युक्त
ते
वे
अपि
भी
माम्
मुझे
एव
ही
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
यजन्ति
यज्ञ करते हैं
अविधि-पूर्वकम्
अविधिपूर्वक (गलत विधि से)।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कौन्तेय! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि अन्ततः सारी पूजा उन्हीं की होती है, क्योंकि सभी देवता उनके ही विभूतियाँ हैं। लेकिन बिना उनके ज्ञान के की गई पूजा अविधिपूर्वक (अनधिकारिक) होती है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे कुन्तीपुत्र! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक (गलत विधि से)।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सभी देवता भगवान के ही विभिन्न रूप हैं। इसलिए उनकी पूजा का फल भी अन्ततः भगवान तक पहुँचता है, परन्तु यह साक्षात् भगवद्-उपासना के समान फलदायी नहीं है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 23/34 68% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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