मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः | तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदये
जो
अपि
भी
अन्य-देवताः
अन्य देवताओं के
भक्ताः
भक्त
यजन्ते
पूजा करते हैं
श्रद्धया
श्रद्धा से
अन्विताः
युक्त
ते
वे
अपि
भी
माम्
मुझे
एव
ही
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
यजन्ति
यज्ञ करते हैं
अविधि-पूर्वकम्
अविधिपूर्वक (गलत विधि से)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कौन्तेय! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि अन्ततः सारी पूजा उन्हीं की होती है, क्योंकि सभी देवता उनके ही विभूतियाँ हैं। लेकिन बिना उनके ज्ञान के की गई पूजा अविधिपूर्वक (अनधिकारिक) होती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे कुन्तीपुत्र! जो भक्त अन्य देवताओं को श्रद्धापूर्वक पूजते हैं, वे भी मुझे ही पूजते हैं, किन्तु अविधिपूर्वक (गलत विधि से)।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सभी देवता भगवान के ही विभिन्न रूप हैं। इसलिए उनकी पूजा का फल भी अन्ततः भगवान तक पहुँचता है, परन्तु यह साक्षात् भगवद्-उपासना के समान फलदायी नहीं है।