मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना | मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदमया
मेरे द्वारा
ततम्
व्याप्त
इदम्
यह
सर्वम्
सम्पूर्ण
जगत्
जगत्
अव्यक्त-मूर्तिना
अव्यक्त रूप से
मत्-स्थानि
मुझमें स्थित हैं
सर्व-भूतानि
सम्पूर्ण प्राणी
न
नहीं
च
और
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
अवस्थितः
स्थित हूँ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक ईश्वर की व्यापकता और अचिन्त्य शक्ति को दर्शाता है। भगवान सभी में व्याप्त हैं, फिर भी वे किसी से आबद्ध नहीं हैं। यह रहस्य अर्जुन को समझने के लिए कहा गया है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यह सम्पूर्ण जगत् मेरे (भगवान के) अव्यक्त स्वरूप से व्याप्त है। सभी प्राणी मुझमें स्थित हैं, फिर भी मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सर्वव्यापी है, फिर भी वह सबसे परे और अलिप्त है। यह अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का समन्वय है। साधक को इस रहस्य को समझना चाहिए कि ईश्वर हर जगह है, लेकिन वह किसी में सीमित नहीं है।