मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् | भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदन
नहीं
च
और
मत्-स्थानि
मुझमें स्थित
भूतानि
प्राणी
पश्य
देख
मे
मेरे
योगम्
योग (प्रभाव)
ऐश्वरम्
ऐश्वर्यपूर्ण
भूत-भृत्
प्राणियों का धारण करने वाला
न
नहीं
च
और
भूत-स्थः
प्राणियों में स्थित
मम
मेरा
आत्मा
स्वरूप
भूत-भावनः
प्राणियों का पालन करने वाला।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
और न ही सब प्राणी मुझमें स्थित हैं (इस प्रकार समझो) – मेरे इस ऐश्वर्ययुक्त योग को देखो। मैं सब प्राणियों का धारण-पोषण करने वाला हूँ, फिर भी उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सब प्राणियों का उत्पादक है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
पिछले श्लोक में कहा गया कि सब मुझमें हैं, लेकिन मैं उनमें नहीं। यहाँ और स्पष्ट किया: वास्तव में प्राणी मुझमें नहीं हैं (मैं उनमें हूँ, ऐसा नहीं है) – यह ईश्वर की अचिन्त्य शक्ति है। वह सबको धारण करता है, फिर भी उनसे परे है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: वास्तव में प्राणी मुझमें स्थित नहीं हैं – मेरे इस दिव्य योग को देखो। मैं सबका धारण-पोषण करता हूँ, फिर भी मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। मेरा आत्मा ही सबका कारण है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर की शक्ति अचिन्त्य है। वह सबमें व्याप्त है, लेकिन सबसे अलग भी है। यही द्वैत-अद्वैत का रहस्य है। साधक को इस अचिन्त्य सत्य को श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना चाहिए।