मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयथा
जैसे
आकाश-स्थितः
आकाश में स्थित
नित्यम्
सदा
वायुः
वायु
सर्वत्र-गः
सर्वत्र गमन करने वाला
महान्
महान्
तथा
वैसे ही
सर्वाणि
सभी
भूतानि
प्राणी
मत्-स्थानि
मुझमें स्थित
इति
इस प्रकार
उपधारय
समझो।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जैसे सर्वत्र गमन करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा तुम समझो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
एक सुन्दर दृष्टान्त: वायु आकाश में सर्वत्र घूमती है, फिर भी आकाश में ही टिकी है। उसी प्रकार सभी प्राणी भगवान में ही स्थित हैं। वे भगवान से अलग नहीं हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जैसे सर्वत्र विचरने वाली महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा समझो।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
जैसे वायु आकाश से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही कोई भी प्राणी ईश्वर से अलग नहीं है। सभी ईश्वर में ही आश्रित हैं। इस चिन्तन से अहंकार नहीं होता और सबमें ईश्वर-दृष्टि आती है।