श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 9 (राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga))

अध्याय 9 · श्लोक 6

राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 34 3 मिनट का पठन 163 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् | तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यथा
जैसे
आकाश-स्थितः
आकाश में स्थित
नित्यम्
सदा
वायुः
वायु
सर्वत्र-गः
सर्वत्र गमन करने वाला
महान्
महान्
तथा
वैसे ही
सर्वाणि
सभी
भूतानि
प्राणी
मत्-स्थानि
मुझमें स्थित
इति
इस प्रकार
उपधारय
समझो।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जैसे सर्वत्र गमन करने वाली महान् वायु सदा आकाश में स्थित रहती है, वैसे ही सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा तुम समझो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

एक सुन्दर दृष्टान्त: वायु आकाश में सर्वत्र घूमती है, फिर भी आकाश में ही टिकी है। उसी प्रकार सभी प्राणी भगवान में ही स्थित हैं। वे भगवान से अलग नहीं हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जैसे सर्वत्र विचरने वाली महान् वायु सदा आकाश में ही स्थित रहती है, उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी मुझमें स्थित हैं – ऐसा समझो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जैसे वायु आकाश से अलग नहीं हो सकती, वैसे ही कोई भी प्राणी ईश्वर से अलग नहीं है। सभी ईश्वर में ही आश्रित हैं। इस चिन्तन से अहंकार नहीं होता और सबमें ईश्वर-दृष्टि आती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 9: राज विद्या राज गुह्य योग (Raja Vidya Raja Guhya Yoga)
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श्लोक 6/34 18% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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