मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप | अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || ३||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदअश्रद्दधानाः
श्रद्धा रहित
पुरुषाः
मनुष्य
धर्मस्य
धर्म के
अस्य
इस
परन्तप
हे शत्रुतापन (अर्जुन)
अप्राप्य
प्राप्त न करके
माम्
मुझे
निवर्तन्ते
लौट आते हैं
मृत्यु-संसार-वर्त्मनि
मृत्यु रूप संसार-मार्ग में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे परंतप (अर्जुन)! इस धर्म (भक्तियोग) में श्रद्धा न रखने वाले पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार-मार्ग में ही आते-जाते रहते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
श्रद्धा आध्यात्मिक जीवन का आधार है। बिना श्रद्धा के किया गया कोई भी कर्म फलदायी नहीं होता। यहाँ भगवान स्पष्ट करते हैं कि जिनमें इस मार्ग के प्रति श्रद्धा नहीं, वे जन्म-मृत्यु के चक्र में ही बने रहते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! इस भक्तियोग रूपी धर्म में श्रद्धा न रखने वाले लोग मुझे प्राप्त नहीं हो पाते और मृत्यु तथा संसार-चक्र में ही पड़े रहते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
श्रद्धा आध्यात्मिक उन्नति की कुंजी है। बिना श्रद्धा के ज्ञान या साधना निष्फल रहती है। इसलिए पहले श्रद्धा उत्पन्न करना आवश्यक है, तभी साधना में रस आता है और मोक्ष संभव है।