ज्ञान षटक (अध्याय १३-१८) अध्याय १७ · कुल २८ श्लोक 6 मिनट अध्ययन

श्रद्धात्रय विभाग योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १७ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा – सात्विक, राजसिक और तामसिक – का वर्णन करते हैं और भोजन, यज्ञ, तप, दान के तीन भेद बताते हैं।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १७ (श्रद्धात्रय विभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

सत्रहवें अध्याय में अर्जुन पूछते हैं कि जो लोग शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धापूर्वक पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है। कृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा – सात्विक, राजसिक और तामसिक – का वर्णन करते हैं और भोजन, यज्ञ, तप, दान के तीन भेद बताते हैं।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / २)

श्लोक १ - २५
अध्याय १७ · श्लोक १

अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१॥

हिंदी अर्थ

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त होकर शास्त्र-विधि को त्यागकर (अन्य देवताओं की) पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? क्या वह सात्त्विक है, राजसी है या तामसी?

अध्याय १७ · श्लोक २

श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥२॥

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् ने कहा – मनुष्यों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है – सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे मुझसे सुनो।

अध्याय १७ · श्लोक ३

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥

हिंदी अर्थ

हे भारत! प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है – वह जैसी श्रद्धा वाला होता है, वैसा ही वह स्वयं होता है।

अध्याय १७ · श्लोक ४

यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥

हिंदी अर्थ

सात्त्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं, राजस लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, और तामस लोग प्रेतों और भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं।

अध्याय १७ · श्लोक ५

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥

हिंदी अर्थ

जो लोग दम्भ और अहंकार से युक्त होकर, कामना, आसक्ति और बल (हठ) से प्रेरित होकर, शास्त्रों द्वारा अविहित घोर तप करते हैं,

अध्याय १७ · श्लोक ६

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥

हिंदी अर्थ

…वे अचेत (मूर्ख) लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय (पंचभौतिक शरीर) को तथा अन्तर्यामी रूप में शरीर में स्थित मुझ परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं। उन्हें तू आसुरी निश्चय वाला जान।

अध्याय १७ · श्लोक ७

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥७॥

हिंदी अर्थ

प्रत्येक व्यक्ति को प्रिय आहार भी तीन प्रकार का होता है, तथा यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस भेद को सुनो।

अध्याय १७ · श्लोक ८

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥८॥

हिंदी अर्थ

जो आहार आयु, बुद्धि (सत्त्व), बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले हों, रसयुक्त, चिकने, स्थिर और हृदय को अच्छे लगने वाले हों – ऐसे आहार सात्त्विक पुरुषों को प्रिय होते हैं।

अध्याय १७ · श्लोक ९

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः। आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९॥

हिंदी अर्थ

कड़वे, खट्टे, नमकीन, अत्यधिक गरम, तीखे, रूखे और जलन पैदा करने वाले आहार राजस पुरुषों को प्रिय होते हैं, जो दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करने वाले होते हैं।

अध्याय १७ · श्लोक १०

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१०॥

हिंदी अर्थ

जो भोजन पका हुआ (और बासी) हो, रसहीन हो, दुर्गन्धित हो, सड़ा हुआ हो, जूठा हो और अपवित्र हो – वह तामस पुरुषों को प्रिय होता है।

अध्याय १७ · श्लोक ११

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥

हिंदी अर्थ

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा, केवल यह मानकर कि यह कर्तव्य है, शास्त्र-विधि के अनुसार किया जाता है – वह सात्त्विक होता है।

अध्याय १७ · श्लोक १२

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥

हिंदी अर्थ

परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा से तथा दम्भ (दिखावे) के लिए किया जाता है – उस यज्ञ को तू राजस जान।

अध्याय १७ · श्लोक १३

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३॥

हिंदी अर्थ

जो यज्ञ विधि-हीन हो, बिना अन्न-वितरण का हो, मन्त्र-हीन हो, बिना दक्षिणा का हो और श्रद्धा-रहित हो – वह तामस कहा जाता है।

अध्याय १७ · श्लोक १४

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४॥

हिंदी अर्थ

देवताओं, ब्राह्मणों, गुरुओं और बुद्धिमानों की पूजा, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – यह शारीरिक तप कहा जाता है।

अध्याय १७ · श्लोक १५

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५॥

हिंदी अर्थ

जो वचन न अप्रिय हो, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, तथा वेदादि शास्त्रों का स्वाध्याय – यह वाणी से किया जाने वाला तप है।

अध्याय १७ · श्लोक १६

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥१६॥

हिंदी अर्थ

मन की प्रसन्नता, सौम्यता, मौन, आत्म-निग्रह (मन को वश में रखना) और भावों (विचारों) की पवित्रता – यह मानसिक तप कहा जाता है।

अध्याय १७ · श्लोक १७

श्रद्धया परया तप्तं तपस्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७॥

हिंदी अर्थ

इस प्रकार तीन प्रकार का तप, जो श्रद्धापूर्वक, फल की इच्छा न रखने वाले और युक्त (एकाग्र) पुरुषों द्वारा किया जाता है – वह सात्त्विक कहा जाता है।

अध्याय १७ · श्लोक १८

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥

हिंदी अर्थ

जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए तथा दम्भ (पाखंड) से किया जाता है – वह राजस कहा गया है, जो चंचल (थोड़े समय का) और अनित्य है।

अध्याय १७ · श्लोक १९

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥

हिंदी अर्थ

जो तप मूढ़ ग्रह (मूर्खतापूर्ण आग्रह) से, अपनी पीड़ा (शरीर को कष्ट देकर) किया जाता है, अथवा दूसरों का विनाश करने के उद्देश्य से – वह तामस कहा गया है।

अध्याय १७ · श्लोक २०

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥

हिंदी अर्थ

जो दान उपकार की आशा बिना, केवल "देना कर्तव्य है" ऐसे भाव से, उचित देश, काल और पात्र को दिया जाता है – वह दान सात्त्विक कहा गया है।

अध्याय १७ · श्लोक २१

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥

हिंदी अर्थ

परन्तु जो दान बदले की भावना से, या फल की इच्छा से, या कष्ट (अरुचि) के साथ दिया जाता है – वह दान राजस कहा गया है।

अध्याय १७ · श्लोक २२

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२॥

हिंदी अर्थ

जो दान अनुचित देश-काल में, अपात्रों को, बिना सत्कार के और तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है – वह तामस कहा गया है।

अध्याय १७ · श्लोक २३

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः। ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥२३॥

हिंदी अर्थ

ॐ, तत्, सत् – यह ब्रह्म (परमात्मा) का तीन प्रकार से निर्देश (नाम) कहा गया है। इसी (तीन नामों) द्वारा प्राचीन काल में ब्राह्मण, वेद और यज्ञ रचे गए।

अध्याय १७ · श्लोक २४

तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥२४॥

हिंदी अर्थ

इसलिए, वेदों के अनुयायी (ब्रह्मवादी) लोग शास्त्र-विधि से नियत यज्ञ, दान और तप की क्रियाओं को "ॐ" का उच्चारण करके ही आरम्भ करते हैं।

अध्याय १७ · श्लोक २५

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥

हिंदी अर्थ

फल की इच्छा न रखते हुए, "तत्" का उच्चारण करके, मोक्ष के इच्छुक पुरुषों द्वारा यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाएँ की जाती हैं।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
श्रद्धात्रय विभाग योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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