श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 5

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 4 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

8 पद
अशास्त्रविहितम्
not prescribed by the scriptures
घोरम्
severe
तप्यन्ते
perform
ये
those who
तपः
austerity
जनाः
persons
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः
filled with hypocrisy and egoism
कामरागबलान्विताः
possessed by the force of desire and attachment.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो लोग दम्भ और अहंकार से युक्त होकर, कामना, आसक्ति और बल (हठ) से प्रेरित होकर, शास्त्रों द्वारा अविहित घोर तप करते हैं,

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक उन लोगों का वर्णन करता है जो शास्त्रीय मार्ग को छोड़कर अपनी इच्छाओं और अहंकार के वशीभूत होकर कठोर तपस्या करते हैं। ऐसी तपस्या अक्सर दूसरों को दिखाने या अपने बल के प्रदर्शन के लिए होती है। This verse describes those who perform severe austerities not sanctioned by scriptures, driven by hypocrisy, ego, desire, and attachment.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि कुछ लोग शास्त्रों में न बताए गए घोर तप को करते हैं, जो दम्भ (पाखंड) और अहंकार से युक्त होते हैं, तथा कामना, आसक्ति और हठ के बल से प्रेरित होते हैं। ऐसी तपस्या का उद्देश्य आध्यात्मिक उन्नति न होकर सांसारिक लाभ या प्रतिष्ठा होता है।

The Lord says: There are those who practice severe austerities not prescribed by the scriptures, full of hypocrisy and egoism, driven by the force of desire and attachment. Such austerities are performed for show or worldly gains, not for spiritual purification.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 5/28 18% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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