श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 6

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 4 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
कर्षयन्तः
tormenting
शरीरस्थम्
dwelling in the body
भूतग्रामम्
the aggregate of elements
अचेतसः
senseless
माम्
Me
च
and
एव
also
अन्तःशरीरस्थम्
dwelling within the body
तान्
them
विद्धि
know
आसुरनिश्चयान्
of demonic resolves.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

…वे अचेत (मूर्ख) लोग शरीर में स्थित भूतसमुदाय (पंचभौतिक शरीर) को तथा अन्तर्यामी रूप में शरीर में स्थित मुझ परमात्मा को भी पीड़ा पहुँचाते हैं। उन्हें तू आसुरी निश्चय वाला जान।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

पिछले श्लोक में वर्णित लोग न केवल अपने शरीर (भूत-समुदाय) को क्षति पहुँचाते हैं, बल्कि अज्ञानवश उस परमात्मा को भी पीड़ित करते हैं जो उनके हृदय में स्थित है। उनका दृष्टिकोण आसुरी होता है। Such people, by tormenting their own body and the indwelling Self, act with demonic determination.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि ऐसे अज्ञानी लोग, जो शास्त्रविरुद्ध तप करते हैं, न केवल अपने शरीर (भूत-समुदाय) को कष्ट पहुँचाते हैं, बल्कि उस अन्तर्यामी परमात्मा को भी, जो उनके शरीर में स्थित है। उनका निश्चय आसुरी होता है – वे असुरों के समान हैं।

The Lord declares: Such senseless people, by tormenting the physical elements of their body, also torment Me who dwells within as the Inner Self. Know them to be of demonic resolves, because their actions are against the divine purpose.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 6 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 6/28 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!