मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु॥७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदआहार
food
तु
indeed
अपि
also
सर्वस्य
of all
त्रिविध
threefold
भवति
is
प्रियः
dear
यज्ञ
sacrifice
तप
austerity
तथा
and
दानम्
charity
तेषाम्
of them
भेदम्
the distinction
इमम्
this
शृणु
hear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
प्रत्येक व्यक्ति को प्रिय आहार भी तीन प्रकार का होता है, तथा यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस भेद को सुनो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अब भगवान् आहार, यज्ञ, तप और दान – इन चार मूलभूत क्रियाओं को तीन गुणों के आधार पर वर्गीकृत करने के लिए कहते हैं। यह वर्गीकरण व्यक्ति की श्रद्धा और स्वभाव को समझने में सहायक है। Now the Lord classifies food, sacrifice, austerity, and charity according to the three gunas, helping us understand how one's faith expresses in daily activities.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् अब आहार, यज्ञ, तप और दान – इन चार क्रियाओं के तीन प्रकारों का वर्णन करने के लिए कहते हैं। जिस प्रकार श्रद्धा तीन प्रकार की होती है, उसी प्रकार ये क्रियाएँ भी व्यक्ति के गुणों के अनुसार तीन रूपों में पाई जाती हैं।
The Lord now states that food, sacrifice, austerity, and charity – all are also threefold according to the gunas. He invites Arjuna to listen to the distinctions, as understanding them helps one choose a path that leads to purity.