श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 4

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 4 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यजन्ते
worship
सात्त्विका
the sattvic (people)
देवान्
the gods
यक्षरक्षांसि
the yaksas and raksasas
राजसाः
the rajasic
प्रेतान्
the departed spirits
भूतगणान्
the hosts of bhutas (goblins)
च
and
अन्ये
others
यजन्ते
worship
तामसा
the tamasic
जनाः
people.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सात्त्विक लोग देवताओं की पूजा करते हैं, राजस लोग यक्षों और राक्षसों की पूजा करते हैं, और तामस लोग प्रेतों और भूत-प्रेतों की पूजा करते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक तीनों गुणों के अनुसार पूजा के विभिन्न रूपों को दर्शाता है। सात्त्विक लोग उच्च देवताओं की उपासना करते हैं, राजस लोग शक्ति और धन के प्रतीक यक्ष-राक्षसों की, और तामस लोग निम्न योनियों (प्रेत, भूत) की। This verse categorizes different forms of worship according to the three gunas, showing how the object of worship reflects the worshipper's inner quality.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् बताते हैं कि तीनों प्रकार के लोग अपनी श्रद्धा के अनुरूप भिन्न-भिन्न वस्तुओं की पूजा करते हैं: सात्त्विक लोग देवताओं की, राजस लोग यक्षों और राक्षसों (शक्ति एवं भोग के प्रतीक) की, और तामस लोग प्रेतों एवं भूतगणों (निम्न योनियों) की। यह वर्गीकरण आध्यात्मिक स्तर को दर्शाता है।

The Lord explains that according to their dominant guna, people worship different entities: the sattvic worship celestial gods, the rajasic worship powerful beings like yakshas and rakshasas, and the tamasic worship departed spirits and ghosts. This classification reflects the spiritual evolution of the worshipper.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 4/28 14% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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