मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदसत्त्वानुरूपा
according to the nature
सर्वस्य
of everyone
श्रद्धा
faith
भवति
is
भारत
O Bharata
श्रद्धामयः
made up of faith
अयम्
this
पुरुषः
person
यः
who
यत्
what
श्रद्धः
whose faith
सः
he
एव
indeed
सः
that.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके स्वभाव के अनुसार होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है – वह जैसी श्रद्धा वाला होता है, वैसा ही वह स्वयं होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक एक महत्वपूर्ण सिद्धांत प्रतिपादित करता है कि मनुष्य का चरित्र और व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा (गहरी आस्था) से निर्मित होता है। जैसी श्रद्धा, वैसा मनुष्य। यह बताता है कि आस्था के अनुसार व्यक्ति का स्वरूप बनता है। This verse establishes that a person's character is shaped by his fundamental faith. As is the faith, so is the person.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् अर्जुन (भारत) को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा उसके अंतर्मन की प्रकृति के अनुरूप होती है। मनुष्य श्रद्धा से ही निर्मित है – उसका व्यक्तित्व उसकी श्रद्धा का प्रतिबिंब है। जैसी उसकी श्रद्धा, वैसा ही वह होता है।
The Lord tells Arjuna: Everyone's faith corresponds to their inner nature. A person is verily made of faith – whatever his faith is, that he indeed becomes. This verse underscores the power of belief in shaping one's entire being.