मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु॥२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदश्रीभगवान्
the Lord
उवाच
said
त्रिविधा
threefold
भवति
is
श्रद्धा
faith
देहिनाम्
of the embodied beings
सा
that
स्वभावजा
born of one's own nature
सात्त्विकी
sattvic
राजसी
rajasic
च
and
एव
indeed
तामसी
tamasic
च
and
इति
thus
ताम्
that
शृणु
hear.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् ने कहा – मनुष्यों की श्रद्धा उनके स्वभाव के अनुसार तीन प्रकार की होती है – सात्त्विकी, राजसी और तामसी। उसे मुझसे सुनो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते हैं कि प्रत्येक जीव की श्रद्धा उसके अंतर्निहित स्वभाव (संस्कारों) से उत्पन्न होती है और तीन गुणों में विभाजित है। यह वर्गीकरण आगे के विवेचन का आधार बनता है। The Lord replies that faith arises from one's innate nature and is of three types according to the three gunas – sattva, rajas, and tamas.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् कृष्ण कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा (आस्था) उसके स्वभाव से उत्पन्न होती है, और वह तीन प्रकार की होती है – सात्त्विकी, राजसी और तामसी। यह वर्गीकरण मनुष्य के आंतरिक गुणों पर आधारित है।
Lord Krishna states that the faith of all human beings is born of their inherent nature and is of three kinds – sattvic, rajasic, and tamasic. This classification is based on the predominance of the three gunas in one's personality.