श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 1

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 4 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
अर्जुन
Arjuna
उवाच
said
ये
those who
शास्त्रविधिम्
the ordinances of the scriptures
उत्सृज्य
having abandoned
यजन्ते
worship
श्रद्धया
with faith
अन्विताः
endowed
तेषाम्
their
निष्ठा
steadfastness
तु
indeed
का
what
कृष्ण
O Krishna
सत्त्वम्
sattva
आहो
or
रजः
rajas
तमः
tamas.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण! जो श्रद्धा से युक्त होकर शास्त्र-विधि को त्यागकर (अन्य देवताओं की) पूजा करते हैं, उनकी स्थिति क्या है? क्या वह सात्त्विक है, राजसी है या तामसी?

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अर्जुन का प्रश्न उन लोगों के बारे में है जो शास्त्रीय विधानों का पालन न करते हुए भी श्रद्धापूर्वक उपासना करते हैं। वह जानना चाहते हैं कि उनकी श्रद्धा किस गुण से प्रभावित है। Arjuna's question pertains to those who worship with faith but without following scriptural injunctions, and he wants to know the nature of their faith.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अर्जुन भगवान कृष्ण से प्रश्न करते हैं कि जो लोग शास्त्रों के नियमों की अवहेलना करते हुए भी श्रद्धापूर्वक देवताओं की पूजा करते हैं, उनकी आस्था की प्रकृति क्या है – सात्त्विक, राजसी या तामसी? यह प्रश्न धार्मिक आचरण और शास्त्रीय आज्ञा के बीच के संबंध को स्पष्ट करने के लिए है।

Arjuna asks Krishna: What is the nature of the faith of those who worship with devotion but disregard scriptural injunctions? Is it sattvic, rajasic, or tamasic? This question sets the stage for the classification of faith and actions according to the three gunas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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