मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥१२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदअभिसंधाय
desiring
तु
indeed
फलम्
fruit
दम्भार्थम्
for show
अपि
also
च
and
एव
certainly
यत्
which
इज्यते
is performed
भरतश्रेष्ठ
O best of the Bharatas
तम्
that
यज्ञम्
sacrifice
विद्धि
know
राजसम्
rajasic.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु हे भरतश्रेष्ठ! जो यज्ञ फल की इच्छा से तथा दम्भ (दिखावे) के लिए किया जाता है – उस यज्ञ को तू राजस जान।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस यज्ञ वह है जिसमें फल की आकांक्षा और दिखावा (प्रतिष्ठा) प्रमुख होता है। ऐसा यज्ञ भक्ति और कर्तव्य की भावना से रहित होता है। A rajasic sacrifice is performed with the desire for rewards and for ostentation, lacking purity of motive.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भरतश्रेष्ठ (अर्जुन)! जो यज्ञ फल की इच्छा रखकर तथा दम्भ (प्रदर्शन) के उद्देश्य से किया जाता है, उसे राजस यज्ञ जानो। राजस यज्ञ में कर्ता का स्वार्थ और अहंकार झलकता है।
O best of the Bharatas (Arjuna)! That sacrifice which is performed with a desire for its fruits and for the sake of ostentation – know that to be rajasic. In such a sacrifice, the performer is motivated by selfishness and ego.