श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 11

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 3 मिनट का पठन 114 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अफलाकाङ्क्षिभि
by those who desire no fruit
यज्ञ
sacrifice
विधिदृष्ट
according to the scriptural ordinance
य
which
इज्यते
is performed
यष्टव्यम्
should be performed
एव
indeed
इति
thus
मन
mind
समाधाय
fixing
स
that
सात्त्विक
sattvic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वालों द्वारा, केवल यह मानकर कि यह कर्तव्य है, शास्त्र-विधि के अनुसार किया जाता है – वह सात्त्विक होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक यज्ञ वह है जो बिना किसी फल की आकांक्षा के, केवल कर्तव्य-बुद्धि से, शास्त्रीय विधि के अनुसार किया जाता है। यह शुद्ध भाव और समर्पण का प्रतीक है। A sattvic sacrifice is performed without desire for reward, strictly according to scriptural rules, with the conviction that it is one's duty.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् कहते हैं कि जो यज्ञ फल की इच्छा न रखने वाले व्यक्तियों द्वारा, शास्त्रों में बताए गए विधान के अनुसार, केवल यह भाव रखते हुए कि यज्ञ करना कर्तव्य है, किया जाता है – वह यज्ञ सात्त्विक कहलाता है।

The Lord says: That sacrifice is sattvic which is performed according to the scriptural injunctions, by those who have no desire for the fruits, and who perform it with the firm conviction that it is their duty.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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