श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 15

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 3 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
अनुद्वेगकरम्
not causing distress
वाक्यम्
speech
सत्यम्
truthful
प्रियहितम्
agreeable and beneficial
च
and
यत्
which
स्वाध्यायाभ्यसनम्
study of the scriptures
च
and
एव
also
वाङ्मयम्
of speech
तप
austerity
उच्यते
is said.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो वचन न अप्रिय हो, सत्य हो, प्रिय हो और हितकारी हो, तथा वेदादि शास्त्रों का स्वाध्याय – यह वाणी से किया जाने वाला तप है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

वाणी का तप है: ऐसी बोली जो किसी को पीड़ा न पहुँचाए, सत्य हो, प्रिय और हितकर हो। साथ ही शास्त्रों का नियमित अध्ययन भी इसमें सम्मिलित है। Austerity of speech involves speaking words that are not agitating, truthful, pleasant, and beneficial, along with regular study of scriptures.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वाणी से किया जाने वाला तप है: ऐसे वचन बोलना जो किसी को उद्वेग (पीड़ा) न दें, सत्य हों, प्रिय हों और हितकारी हों। इसके साथ ही शास्त्रों का स्वाध्याय (अध्ययन) भी वाणी का तप माना गया है।

Austerity of speech consists of speaking words that do not cause distress, that are truthful, pleasant, and beneficial, and also the regular recitation and study of scriptures.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 15/28 54% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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