श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 20

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 3 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्॥२०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
दातव्यम्
fit to be given
इति
thus
यत्
which
दानम्
charity
दीयते
is given
अनुपकारिणे
to one who does no service in return
देशे
at the proper place
काले
at the proper time
च
and
पात्रे
to a worthy person
च
and
तत्
that
दानम्
charity
सात्त्विकम्
sattvic
स्मृतम्
is considered.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो दान उपकार की आशा बिना, केवल "देना कर्तव्य है" ऐसे भाव से, उचित देश, काल और पात्र को दिया जाता है – वह दान सात्त्विक कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक दान वह है जो बिना किसी प्रत्युपकार की इच्छा के, केवल कर्तव्य समझकर, उचित स्थान, समय और पात्र (योग्य व्यक्ति) को दिया जाता है। Sattvic charity is given without any expectation of return, with a sense of duty, at the proper place and time, and to a worthy recipient.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान् अब दान के तीन प्रकार बताते हैं। सात्त्विक दान वह है जो बिना किसी बदले की भावना के, केवल इसलिए दिया जाता है कि देना कर्तव्य है। वह उचित स्थान पर, उचित समय पर और योग्य पात्र को दिया जाता है।

The Lord now describes the threefold charity. Sattvic charity is that which is given without any expectation of return, with the sense that it is one's duty, and it is given at the right place, at the right time, and to a worthy person.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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