मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदमूढग्राहेण
with foolish effort
आत्मन
self
यत्
which
पीडया
by torturing
क्रियते
is performed
तप
austerity
परस्य
of others
उत्सादनार्थम्
for the purpose of causing injury
वा
or
तत्
that
तामसम्
tamasic
उदाहृतम्
is declared.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो तप मूढ़ ग्रह (मूर्खतापूर्ण आग्रह) से, अपनी पीड़ा (शरीर को कष्ट देकर) किया जाता है, अथवा दूसरों का विनाश करने के उद्देश्य से – वह तामस कहा गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
तामस तप वह है जो अज्ञान और मूर्खतापूर्ण हठ से किया जाता है, जिसमें स्वयं को या दूसरों को कष्ट देना शामिल होता है। यह किसी आध्यात्मिक उद्देश्य से न होकर हिंसा या विनाश की भावना से प्रेरित होता है। Tamasic austerity is performed out of foolish stubbornness, involving self-torture, or with the intention of harming others. It is devoid of wisdom and leads to suffering.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् अब तामस तप का वर्णन करते हैं: जो तप मूढ़ ग्रह (हठपूर्ण अज्ञान) से, स्वयं को पीड़ा देकर (जैसे अकारण काया-क्लेश) किया जाता है, या दूसरों के विनाश के उद्देश्य से (ताकि किसी को हानि पहुँचे) किया जाता है – वह तामस तप कहलाता है।
The Lord describes tamasic austerity: that which is performed out of foolish obstinacy, involving self-torture, or with the intention of causing harm to others – is called tamasic. Such austerity is based on ignorance and is detrimental.