मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदसत्कार
hospitality
मान
honor
पूजार्थम्
for the sake of worship/reverence
तप
austerity
दम्भेन
with hypocrisy
च
and
एव
indeed
यत्
which
क्रियते
is performed
तत्
that
इह
here
प्रोक्तम्
declared
राजसम्
rajasic
चलम्
temporary
अध्रुवम्
unstable.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो तप सत्कार, मान और पूजा पाने के लिए तथा दम्भ (पाखंड) से किया जाता है – वह राजस कहा गया है, जो चंचल (थोड़े समय का) और अनित्य है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस तप वह है जो लोक-प्रतिष्ठा, सम्मान, या पूजा पाने के लिए किया जाता है और इसमें दम्भ (दिखावा) होता है। ऐसा तप न तो स्थिर होता है और न ही दीर्घकालिक लाभ देता है। Rajasic austerity is performed for the sake of receiving honor, respect, and adoration, and it is accompanied by pride and hypocrisy. It is unstable and yields only temporary results.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान् कहते हैं कि जो तप सत्कार (आदर), मान (सम्मान) और पूजा (प्रतिष्ठा) प्राप्त करने के उद्देश्य से, तथा दम्भ (पाखंड) के साथ किया जाता है – वह राजस तप है। ऐसा तप चंचल और अस्थायी होता है, अर्थात इसका फल नाशवान होता है।
The Lord declares: That austerity which is performed with the aim of receiving honor, respect, and reverence, and with hypocrisy – is rajasic. It is unstable and temporary, yielding only fleeting results.