श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 17

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 3 मिनट का पठन 123 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रद्धया परया तप्तं तपस्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
श्रद्धया
with faith
परया
supreme
तप्तम्
practiced
तप
austerity
त्रिविधम्
threefold
नरैः
by men
अफलाकाङ्क्षिभि
by those without desire for fruit
युक्तैः
steadfast
सात्त्विकम्
sattvic
परिचक्षते
is declared.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस प्रकार तीन प्रकार का तप, जो श्रद्धापूर्वक, फल की इच्छा न रखने वाले और युक्त (एकाग्र) पुरुषों द्वारा किया जाता है – वह सात्त्विक कहा जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब भगवान् बताते हैं कि पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप (शारीरिक, वाचिक, मानसिक) जब परम श्रद्धा से, बिना फल की इच्छा के और योग्यतापूर्वक किए जाते हैं, तो वे सात्त्विक होते हैं। The threefold austerity (physical, verbal, mental) when performed with supreme faith, without desire for results, and with steadfastness, is declared sattvic.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

पूर्व श्लोकों में बताए गए शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप – जब इन्हें अत्यंत श्रद्धा के साथ, फल की इच्छा न रखते हुए, और योग (एकाग्रता) से युक्त होकर किया जाता है, तो वह तप सात्त्विक कहलाता है।

The threefold austerity – of body, speech, and mind – when practiced with supreme faith, without any desire for the fruits, and with steadfast devotion, is declared to be sattvic.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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