मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥२१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदयत्
which
तु
but
प्रत्युपकारार्थम्
for the sake of getting something in return
फलम्
fruit
उद्दिश्य
aiming at
वा
or
पुनः
again
दीयते
is given
च
and
परिक्लिष्टम्
grudgingly
तत्
that
दानम्
charity
राजसम्
rajasic
स्मृतम्
is considered.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु जो दान बदले की भावना से, या फल की इच्छा से, या कष्ट (अरुचि) के साथ दिया जाता है – वह दान राजस कहा गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस दान वह है जो प्रत्युपकार की आशा में, किसी फल की इच्छा से, या अरुचि एवं कष्ट के साथ दिया जाता है। Rajasic charity is given with the expectation of something in return, or for the sake of a reward, or with reluctance, and is impure in motive.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
राजस दान वह है जो बदले में कुछ पाने की इच्छा से, या किसी फल (पुण्य, लाभ) की आशा से दिया जाता है, या जिसे देते समय दिल में कष्ट या अरुचि होती है (जैसे मजबूरी में देना)।
Rajasic charity is that which is given with the expectation of something in return, or with the aim of gaining some reward, or which is given reluctantly and with a feeling of distress.