श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 17 (श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 17 · श्लोक 22

श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 28 3 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
अदेशकाले
at improper place and time
यत्
which
दानम्
charity
अपात्रेभ्य
to unworthy persons
च
and
दीयते
is given
असत्कृतम्
without respect
अवज्ञातम्
with contempt
तत्
that
तामसम्
tamasic
उदाहृतम्
is declared.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो दान अनुचित देश-काल में, अपात्रों को, बिना सत्कार के और तिरस्कारपूर्वक दिया जाता है – वह तामस कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तामस दान वह है जो अनुचित स्थान-समय पर, अयोग्य व्यक्ति को, बिना किसी सम्मान के और उपेक्षा या तिरस्कार के भाव से दिया जाता है। Tamasic charity is given at the wrong place and time, to unworthy persons, without respect, and with disdain. It is impure and harmful.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

तामस दान वह है जो अनुचित स्थान (जहाँ देना उचित न हो) और अनुचित समय पर, अपात्र (अयोग्य) व्यक्तियों को, बिना किसी सत्कार के और तिरस्कार (अवज्ञा) के भाव से दिया जाता है। ऐसा दान निम्नतम कोटि का होता है।

Tamasic charity is that which is given at an improper place and time, to unworthy persons, without respect and with contempt. Such charity is done with ignorance and negativity.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 17: श्रद्धात्रय विभाग योग (Sraddhatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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