मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः। दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥२५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदतत्
Tat
इति
thus
अनभिसन्धाय
without desiring
फलम्
fruit
यज्ञ
sacrifice
तपः
austerity
क्रियाः
acts
दान
charity
क्रियाः
acts
च
and
विविधाः
various
क्रियन्ते
are performed
मोक्षकाङ्क्षिभि
by those seeking liberation.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
फल की इच्छा न रखते हुए, "तत्" का उच्चारण करके, मोक्ष के इच्छुक पुरुषों द्वारा यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाएँ की जाती हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो लोग मोक्ष के आकांक्षी हैं, वे फल की इच्छा त्यागकर, केवल "तत्" (वह – परब्रह्म के उद्देश्य से) का उच्चारण करते हुए यज्ञ, तप और दान करते हैं। इससे उनके कर्म निष्काम हो जाते हैं। Those who desire liberation perform acts of sacrifice, austerity, and charity uttering "Tat", without any longing for the fruits, thus dedicating all actions to the Supreme.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो साधक मोक्ष (मुक्ति) की इच्छा रखते हैं, वे "तत्" का उच्चारण करते हुए तथा फल की आसक्ति न रखते हुए, यज्ञ, तप और दान की विविध क्रियाओं को सम्पन्न करते हैं। "तत्" का अर्थ है "वह परमात्मा" – वे सब कुछ उसी के लिए करते हैं।
Those who long for liberation perform various acts of sacrifice, austerity, and charity uttering "Tat", without any desire for the fruits. They dedicate all actions to the Supreme, seeking only freedom.