भक्ति षटक (अध्याय ७-१२) अध्याय ७ · कुल ३० श्लोक 4 मिनट अध्ययन

ज्ञान विज्ञान योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ७ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) का वर्णन करते हैं। वह अपनी योगमाया, अपने दो प्रकार के स्वरूप (परा और अपरा प्रकृति) तथा भक्ति द्वारा उन्हें जानने के मार्ग की व्याख्या करते हैं।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ७ (ज्ञान विज्ञान योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और विज्ञान (साक्षात्कार) का वर्णन करते हैं। वह अपनी योगमाया, अपने दो प्रकार के स्वरूप (परा और अपरा प्रकृति) तथा भक्ति द्वारा उन्हें जानने के मार्ग की व्याख्या करते हैं।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / २)

श्लोक १ - २५
अध्याय ७ · श्लोक १

श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः । असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥ १॥

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ! मुझमें आसक्त मनवाला, योग का अभ्यास करता हुआ तथा मेरे आश्रय में रहकर तुम मुझे संपूर्णतया और संशयरहित होकर कैसे जानोगे, उसे सुनो।

अध्याय ७ · श्लोक २

ज्ञानं ते ऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः । यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥ २॥

हिंदी अर्थ

मैं तुझे इस ज्ञान और विज्ञान सहित सम्पूर्ण रूप से कहूँगा, जिसे जानने के बाद इस लोक में फिर कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता।

अध्याय ७ · श्लोक ३

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये । यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥ ३॥

हिंदी अर्थ

हजारों मनुष्यों में से कोई एक सिद्धि (पूर्णता) के लिए प्रयत्न करता है; और उन प्रयत्नशील सिद्धों में से भी कोई एक ही मुझे तत्त्व से जानता है।

अध्याय ७ · श्लोक ४

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४॥

हिंदी अर्थ

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इस प्रकार यह मेरी प्रकृति आठ प्रकार से विभाजित है।

अध्याय ७ · श्लोक ५

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥

हिंदी अर्थ

हे महाबाहो! यह (आठ तत्त्वों वाली) मेरी अपरा (नीची) प्रकृति है, परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (श्रेष्ठ) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिससे यह जगत धारण किया जाता है।

अध्याय ७ · श्लोक ६

एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६॥

हिंदी अर्थ

समस्त प्राणी इन दोनों (अपरा और परा प्रकृति) से उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू समझ। और मैं सम्पूर्ण जगत का उत्पत्ति स्थान तथा प्रलय स्थान भी हूँ।

अध्याय ७ · श्लोक ७

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७॥

हिंदी अर्थ

हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत धागे में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें पिरोया हुआ है।

अध्याय ७ · श्लोक ८

रसो ऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८॥

हिंदी अर्थ

हे कुन्तीपुत्र! मैं जलों में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पौरुष हूँ।

अध्याय ७ · श्लोक ९

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९॥

हिंदी अर्थ

मैं पृथ्वी में पुण्य गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; समस्त प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।

अध्याय ७ · श्लोक १०

बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् । बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥ १०॥

हिंदी अर्थ

हे पार्थ! मुझे समस्त प्राणियों का सनातन बीज जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि हूँ और तेजस्वियों का तेज हूँ।

अध्याय ७ · श्लोक ११

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११॥

हिंदी अर्थ

हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का बल हूँ, जो काम और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न होने वाली कामना मैं हूँ।

अध्याय ७ · श्लोक १२

ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२॥

हिंदी अर्थ

जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं – वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू जान। परन्तु मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।

अध्याय ७ · श्लोक १३

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३॥

हिंदी अर्थ

इन तीनों गुणों से बने हुए भावों से सम्पूर्ण जगत मोहित है, इसलिए इन गुणों से परे तथा अविनाशी मुझे नहीं जानता।

अध्याय ७ · श्लोक १४

दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४॥

हिंदी अर्थ

यह मेरी दिव्य माया, जो गुणों से बनी है, अत्यन्त दुस्तर है। परन्तु जो मुझमें ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।

अध्याय ७ · श्लोक १५

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५॥

हिंदी अर्थ

दुष्कर्मी, मूढ़, नराधम तथा जिनका ज्ञान माया से हर लिया गया है और जो आसुरी भाव को आश्रित हैं, वे मुझे नहीं भजते।

अध्याय ७ · श्लोक १६

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यात्मा मनुष्य मेरा भजन करते हैं: आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (ज्ञान की इच्छा रखने वाला), अर्थार्थी (सांसारिक वस्तुओं का इच्छुक) और ज्ञानी।

अध्याय ७ · श्लोक १७

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७॥

हिंदी अर्थ

उन (चारों) में ज्ञानी, जो नित्ययुक्त और एकनिष्ठ भक्त है, सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।

अध्याय ७ · श्लोक १८

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८॥

हिंदी अर्थ

ये सभी (चारों) उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह युक्तचित्त होकर मुझ अनुत्तम गति में ही स्थित रहता है।

अध्याय ७ · श्लोक १९

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९॥

हिंदी अर्थ

अनेक जन्मों के अन्त में ज्ञानवान् पुरुष मुझे इस प्रकार जानकर कि "वासुदेव सब कुछ है" मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है।

अध्याय ७ · श्लोक २०

कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्ते ऽन्यदेवताः । तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥ २०॥

हिंदी अर्थ

जिनका ज्ञान विविध कामनाओं से हर लिया गया है, वे अपनी-अपनी प्रकृति के वशीभूत होकर अन्य देवताओं की शरण लेते हैं और उन-उन के नियमों का पालन करते हैं।

अध्याय ७ · श्लोक २१

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१॥

हिंदी अर्थ

जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहता है, उस-उसकी श्रद्धा को मैं उसी देवता में अचल कर देता हूँ।

अध्याय ७ · श्लोक २२

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२॥

हिंदी अर्थ

वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस (देवता) की आराधना करता है और उससे अपने अभीष्ट पदार्थों को प्राप्त करता है – वे सब मेरे द्वारा ही नियत किए गए होते हैं।

अध्याय ७ · श्लोक २३

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् । देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥ २३॥

हिंदी अर्थ

उन अल्पबुद्धि वालों का वह फल नाशवान् होता है। देवताओं के पूजक देवताओं को प्राप्त होते हैं, परन्तु मेरे भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं।

अध्याय ७ · श्लोक २४

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः । परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥ २४॥

हिंदी अर्थ

अबुद्धि लोग मुझ अव्यक्त को व्यक्त रूप में प्राप्त मानते हैं, वे मेरे परम, अविनाशी और अनुत्तम भाव को नहीं जानते।

अध्याय ७ · श्लोक २५

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः । मूढो ऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥ २५॥

हिंदी अर्थ

मैं योगमाया से आवृत होने के कारण सबके लिए प्रकट नहीं होता। यह मूढ़ संसार मुझ अजन्मा और अविनाशी को नहीं जानता।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
ज्ञान विज्ञान योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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