मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥ १७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदतेषाम्
उनमें से
ज्ञानी
ज्ञानी
नित्ययुक्तः
नित्ययुक्त (सदा मुझमें लगा हुआ)
एकभक्ति
अनन्य भक्ति वाला
विशिष्यते
श्रेष्ठ है
प्रियः
प्रिय
हि
निश्चय ही
ज्ञानिनः
ज्ञानी को
अत्यर्थम्
अत्यन्त
अहम्
मैं
सः
वह
च
भी
मम
मेरा
प्रियः
प्रिय।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
उन (चारों) में ज्ञानी, जो नित्ययुक्त और एकनिष्ठ भक्त है, सर्वश्रेष्ठ है। क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी भक्त सबसे श्रेष्ठ है क्योंकि वह अनन्य भाव से ईश्वर में लीन रहता है और उनके परस्पर प्रेम का संबंध अद्वितीय है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
उन चारों में ज्ञानी भक्त, जो नित्य मुझमें स्थित और अनन्य भक्ति वाला है, सबसे श्रेष्ठ है। क्योंकि मैं ज्ञानी को अत्यन्त प्रिय हूँ और वह मुझे प्रिय है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ज्ञान और भक्ति का संगम सर्वोच्च है। ज्ञानी भक्त ईश्वर के परम प्रेम का पात्र बनता है।