मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदचतुर्विधा
चार प्रकार के
भजन्ते
भजते हैं
माम्
मुझे
जनाः
मनुष्य
सुकृतिनः
पुण्यात्मा
अर्जुन
हे अर्जुन
आर्त
दुःखी
जिज्ञासु
जिज्ञासु
अर्थार्थी
अर्थ (ऐश्वर्य) चाहने वाला
ज्ञानी
ज्ञानी
च
और
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यात्मा मनुष्य मेरा भजन करते हैं: आर्त (दुःखी), जिज्ञासु (ज्ञान की इच्छा रखने वाला), अर्थार्थी (सांसारिक वस्तुओं का इच्छुक) और ज्ञानी।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अब कृष्ण चार प्रकार के भक्तों का वर्णन करते हैं, जो पुण्यशाली होते हैं और भगवान की ओर आकर्षित होते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! चार प्रकार के पुण्यात्मा मनुष्य मेरी भक्ति करते हैं – दुःखी (आर्त), ज्ञान के इच्छुक (जिज्ञासु), धन के इच्छुक (अर्थार्थी), और ज्ञानी।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति के मार्ग पर चलने के लिए पुण्य की आवश्यकता होती है। चाहे कोई किसी भी कारण से ईश्वर की ओर आए, वह पुण्यशाली ही है।