मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः । माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥ १५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदन
नहीं
माम्
मुझे
दुष्कृतिनः
पापी
मूढाः
मूढ़
प्रपद्यन्ते
भजते
नराधमाः
नराधम
मायया
माया से
अपहृतज्ञाना
जिनका ज्ञान हर लिया गया है
आसुरम्
आसुरी
भावम्
भाव को
आश्रिताः
आश्रित हुए।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
दुष्कर्मी, मूढ़, नराधम तथा जिनका ज्ञान माया से हर लिया गया है और जो आसुरी भाव को आश्रित हैं, वे मुझे नहीं भजते।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
चार प्रकार के लोग भगवान की शरण नहीं लेते: पापी, मूर्ख, नीच और आसुरी प्रवृत्ति के लोग।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
दुष्कर्मी, मूढ़ (मूर्ख), नराधम (अधम मनुष्य) तथा जिनका ज्ञान माया द्वारा हर लिया गया है और जो आसुरी भाव को धारण किए हुए हैं – ऐसे लोग मेरी शरण नहीं ग्रहण करते।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान की भक्ति के लिए पवित्रता, बुद्धि और सात्त्विक भाव आवश्यक हैं। पाप और अज्ञान में डूबे लोग भक्ति के पात्र नहीं बन पाते।