मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया । मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥ १४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पददैवी
दिव्य
हि
निश्चय ही
एषा
यह
गुणमयी
गुणों से बनी
मम
मेरी
माया
माया
दुरत्यया
दुस्तर
माम्
मुझको
एव
ही
ये
जो
प्रपद्यन्ते
शरण में आते हैं
मायाम्
माया को
एताम्
इस
तरन्ति
पार करते हैं
ते
वे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यह मेरी दिव्य माया, जो गुणों से बनी है, अत्यन्त दुस्तर है। परन्तु जो मुझमें ही शरण लेते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
माया (अज्ञान) को पार करना बहुत कठिन है, लेकिन ईश्वर की शरण में जाने से वह सरल हो जाती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
यह मेरी दिव्य माया, जो तीनों गुणों से बनी है, अत्यन्त दुर्गम है। परन्तु जो मनुष्य केवल मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
माया के बन्धन से छूटने का एकमात्र उपाय ईश्वर की शरणागति है। भक्ति के बिना माया को पार करना असंभव है।