मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् । मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥ १३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदत्रिभिः
तीनों
गुणमयैः
गुणों से बने
भावैः
भावों द्वारा
एभिः
इन
सर्वम्
सम्पूर्ण
इदम्
यह
जगत्
जगत
मोहितम्
मोहित
न
नहीं
अभिजानाति
जानता
माम्
मुझे
एभ्यः
इनसे
परम्
परे
अव्ययम्
अविनाशी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इन तीनों गुणों से बने हुए भावों से सम्पूर्ण जगत मोहित है, इसलिए इन गुणों से परे तथा अविनाशी मुझे नहीं जानता।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
गुणों के प्रभाव से जीव ईश्वर को नहीं पहचान पाता। वह गुणों में उलझा रहता है और उनसे परे सत्य से अनभिज्ञ रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
तीनों गुणों (सत्त्व, रज, तम) से निर्मित इन भावों से यह सम्पूर्ण जगत मोहित है। इसलिए यह इन गुणों से परे और अविनाशी मुझे नहीं जान पाता।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
गुणों का प्रभाव इतना प्रबल है कि जीव उनमें फँसकर परमात्मा को भूल जाता है। गुणातीत होने पर ही ईश्वर का साक्षात्कार होता है।