मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
20 पदये
जो
च
और
एव
ही
सात्त्विका
सात्त्विक
भावाः
भाव
राजसा
राजस
तामसा
तामस
च
और
ये
जो
मत्तः
मुझसे
एव
ही
इति
इस प्रकार
तान्
उनको
विद्धि
जान
न
नहीं
तु
तो
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
ते
वे
मयि
मुझमें।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं – वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू जान। परन्तु मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सभी गुण (सत्त्व, रज, तम) भगवान से ही उत्पन्न हैं, किन्तु वे उनके अधीन हैं, न कि वे गुणों के अधीन।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं – ऐसा जानो। परन्तु मैं उनमें (आसक्त) नहीं हूँ; वे (गुण) मुझमें हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर गुणातीत है। सभी गुण उसकी शक्ति से प्रकट होते हैं, परन्तु वह स्वयं उनसे परे है।