श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 12

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 125 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये । मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥ १२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

20 पद
ये
जो
च
और
एव
ही
सात्त्विका
सात्त्विक
भावाः
भाव
राजसा
राजस
तामसा
तामस
च
और
ये
जो
मत्तः
मुझसे
एव
ही
इति
इस प्रकार
तान्
उनको
विद्धि
जान
न
नहीं
तु
तो
अहम्
मैं
तेषु
उनमें
ते
वे
मयि
मुझमें।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं – वे सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू जान। परन्तु मैं उनमें नहीं हूँ, वे मुझमें हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सभी गुण (सत्त्व, रज, तम) भगवान से ही उत्पन्न हैं, किन्तु वे उनके अधीन हैं, न कि वे गुणों के अधीन।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो भी सात्त्विक, राजस और तामस भाव हैं, वे सब मुझसे ही उत्पन्न हुए हैं – ऐसा जानो। परन्तु मैं उनमें (आसक्त) नहीं हूँ; वे (गुण) मुझमें हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर गुणातीत है। सभी गुण उसकी शक्ति से प्रकट होते हैं, परन्तु वह स्वयं उनसे परे है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 12 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 12/30 40% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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