मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् । धर्माविरुद्धो भूतेषु कामो ऽस्मि भरतर्षभ ॥ ११॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदबलम्
बल
बलवताम्
बलवानों का
च
और
अहम्
मैं
कामरागविवर्जितम्
काम और आसक्ति से रहित
धर्माविरुद्धः
धर्म के विरुद्ध न होने वाला
भूतेषु
प्राणियों में
कामः
काम
अस्मि
हूँ
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का बल हूँ, जो काम और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के विरुद्ध न होने वाली कामना मैं हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ईश्वर बल का स्रोत है, किन्तु वह बल जो आसक्ति रहित और धर्मानुकूल हो। धर्मसम्मत इच्छा भी ईश्वर का ही रूप है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का वह बल हूँ जो कामना और आसक्ति से रहित है। तथा प्राणियों में धर्म के अनुकूल काम (इच्छा) मैं हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सद्गुणों और शुभ प्रवृत्तियों का आधार है। बल और इच्छा भी यदि सात्त्विक और धर्मसम्मत हों तो वे ईश्वरीय अंश हैं।