मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
18 पदउदाराः
उदार
सर्वे
सभी
एव
ही
एते
ये
ज्ञानी
ज्ञानी
तु
तो
आत्मा
स्वरूप
एव
ही
मे
मेरा
मतम्
मत
आस्थितः
स्थित
सः
वह
हि
निश्चय ही
युक्तात्मा
युक्तचित्त
माम्
मुझको
एव
ही
अनुत्तमाम्
उत्तम
गतिम्
गति (लक्ष्य) मानकर।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ये सभी (चारों) उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह युक्तचित्त होकर मुझ अनुत्तम गति में ही स्थित रहता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ज्ञानी भक्त को भगवान अपने समान मानते हैं, क्योंकि वह पूर्णतया उनमें ही स्थित रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ये सभी (चारों प्रकार के भक्त) उदार (महान) हैं। परन्तु ज्ञानी तो मेरा अपना स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह स्थिरचित्त होकर मुझ परम गति में ही स्थित रहता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ज्ञानी भक्त ईश्वर के साथ एकरूप हो जाता है, उसकी चेतना ईश्वर में लीन रहती है। वह सबसे उदार और पूज्य है।