श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 18

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 139 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥ १८॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

18 पद
उदाराः
उदार
सर्वे
सभी
एव
ही
एते
ये
ज्ञानी
ज्ञानी
तु
तो
आत्मा
स्वरूप
एव
ही
मे
मेरा
मतम्
मत
आस्थितः
स्थित
सः
वह
हि
निश्चय ही
युक्तात्मा
युक्तचित्त
माम्
मुझको
एव
ही
अनुत्तमाम्
उत्तम
गतिम्
गति (लक्ष्य) मानकर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

ये सभी (चारों) उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह युक्तचित्त होकर मुझ अनुत्तम गति में ही स्थित रहता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ज्ञानी भक्त को भगवान अपने समान मानते हैं, क्योंकि वह पूर्णतया उनमें ही स्थित रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

ये सभी (चारों प्रकार के भक्त) उदार (महान) हैं। परन्तु ज्ञानी तो मेरा अपना स्वरूप ही है – ऐसा मेरा मत है। क्योंकि वह स्थिरचित्त होकर मुझ परम गति में ही स्थित रहता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ज्ञानी भक्त ईश्वर के साथ एकरूप हो जाता है, उसकी चेतना ईश्वर में लीन रहती है। वह सबसे उदार और पूज्य है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 18/30 60% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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