श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 19

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते । वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥ १९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
बहूनाम्
अनेक
जन्मनाम्
जन्मों के
अन्ते
अन्त में
ज्ञानवान्
ज्ञानवान् पुरुष
माम्
मुझे
प्रपद्यते
शरण लेता है
वासुदेवः
वासुदेव
सर्वम्
सब कुछ
इति
इस प्रकार
सः
वह
महात्मा
महात्मा
सुदुर्लभः
अत्यन्त दुर्लभ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

अनेक जन्मों के अन्त में ज्ञानवान् पुरुष मुझे इस प्रकार जानकर कि "वासुदेव सब कुछ है" मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ होता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सच्चा ज्ञान अनेक जन्मों के साधना के बाद मिलता है, जब जीव समझ जाता है कि ईश्वर ही सब कुछ है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

अनेक जन्मों के अन्त में ज्ञानी पुरुष मुझे इस प्रकार जानकर कि "वासुदेव ही सब कुछ हैं" मेरी शरण ग्रहण करता है। ऐसा महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

पूर्ण ज्ञान का अर्थ है ईश्वर को सर्वव्यापी और सर्वस्व मान लेना। यह अवस्था बहुत कठिनाई से प्राप्त होती है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 19 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 19/30 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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