मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते । लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥ २२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदस
वह
तया
उस श्रद्धा से
युक्तः
युक्त होकर
तस्य
उस (देवता) की
आराधनम्
आराधना
ईहते
करता है
लभते
प्राप्त करता है
च
और
ततः
उससे
कामान्
अभीष्ट वस्तुओं को
मया
मेरे द्वारा
एव
ही
विहितान्
नियत
हि
निश्चय ही
तान्
उनको।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस (देवता) की आराधना करता है और उससे अपने अभीष्ट पदार्थों को प्राप्त करता है – वे सब मेरे द्वारा ही नियत किए गए होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्त अपनी श्रद्धा से देवता की उपासना करता है और वांछित फल पाता है, किन्तु वास्तव में वह फल भगवान ही देते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता की आराधना करता है और उससे अपने अभीष्ट पदार्थों को प्राप्त करता है – और वे सब मेरे द्वारा ही नियत किए गए होते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सभी फलों का दाता अंततः परमेश्वर ही है। भक्त चाहे किसी भी देवता की उपासना करे, फल तो ईश्वर ही प्रदान करते हैं।