मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति । तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥ २१॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदयः यः
जो-जो
याम् याम्
जिस-जिस
तनुम्
देवता के रूप को
भक्तः
भक्त
श्रद्धया
श्रद्धा से
अर्चितुम्
पूजा करने को
इच्छति
इच्छा करता है
तस्य तस्य
उस-उसकी
अचलाम्
अचल
श्रद्धाम्
श्रद्धा को
ताम्
उसी (देवता) में
एव
ही
विदधामि
स्थिर करता हूँ
अहम्
मैं।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहता है, उस-उसकी श्रद्धा को मैं उसी देवता में अचल कर देता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान सभी की श्रद्धा का सम्मान करते हैं और उसे स्थिर रखते हैं, चाहे वह किसी भी देवता की उपासना क्यों न करता हो।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो-जो भक्त जिस-जिस देवता के रूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहता है, मैं उस-उसकी श्रद्धा को उसी देवता में अचल कर देता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर ही सबके हृदय में स्थित है और प्रत्येक भक्त की श्रद्धा के अनुसार उसे फल प्रदान करता है। वह सभी की भक्ति का सम्मान करता है।