मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रसो ऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः । प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥ ८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदरसः
रस
अहम्
मैं
अप्सु
जल में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
प्रभा
प्रकाश
अस्मि
हूँ
शशिसूर्ययोः
चन्द्रमा और सूर्य में
प्रणवः
प्रणव (ॐ)
सर्ववेदेषु
समस्त वेदों में
शब्दः
शब्द
खे
आकाश में
पौरुषम्
पौरुष
नृषु
मनुष्यों में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे कुन्तीपुत्र! मैं जलों में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, समस्त वेदों में प्रणव (ॐ) हूँ, आकाश में शब्द हूँ और पुरुषों में पौरुष हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण सृष्टि के विभिन्न पदार्थों में अपनी उपस्थिति बताते हैं, जिससे ध्यान और भक्ति में सहायता मिलती है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! मैं जल का रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य का प्रकाश हूँ, सभी वेदों में ॐकार हूँ, आकाश में ध्वनि हूँ, और मनुष्यों में पौरुष (पुरुषार्थ) हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सर्वव्यापी है। हर वस्तु में उसका अंश है। इस भाव से सबमें ईश्वर के दर्शन करना ही सच्ची भक्ति है।