श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 7

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 127 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
मत्तः
मुझसे
परतरम्
परे
न
नहीं
अन्यत्
अन्य
किञ्चित्
कुछ भी
अस्ति
है
धनञ्जय
हे धनंजय
मयि
मुझमें
सर्वम्
सब
इदम्
यह
प्रोतम्
पिरोया हुआ है
सूत्रे
धागे में
मणिगणा
मणियों के समूह
इव
जैसे।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत धागे में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें पिरोया हुआ है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान सर्वोच्च हैं। सारी सृष्टि उनके अधीन है और उनमें आधारित है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! मुझसे परे या मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यह समस्त जगत धागे में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें पिरोया हुआ है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही परम सत्य हैं, सब कुछ उन्हीं पर आश्रित है। जैसे धागा मणियों को एकसूत्र में बाँधे रखता है, वैसे ही ईश्वर सबको धारण किए हुए हैं।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 7/30 23% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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