मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ ७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदमत्तः
मुझसे
परतरम्
परे
न
नहीं
अन्यत्
अन्य
किञ्चित्
कुछ भी
अस्ति
है
धनञ्जय
हे धनंजय
मयि
मुझमें
सर्वम्
सब
इदम्
यह
प्रोतम्
पिरोया हुआ है
सूत्रे
धागे में
मणिगणा
मणियों के समूह
इव
जैसे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ दूसरा कुछ भी नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत धागे में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें पिरोया हुआ है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान सर्वोच्च हैं। सारी सृष्टि उनके अधीन है और उनमें आधारित है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! मुझसे परे या मुझसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है। यह समस्त जगत धागे में पिरोए हुए मणियों के समान मुझमें पिरोया हुआ है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर ही परम सत्य हैं, सब कुछ उन्हीं पर आश्रित है। जैसे धागा मणियों को एकसूत्र में बाँधे रखता है, वैसे ही ईश्वर सबको धारण किए हुए हैं।