श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 6

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 2 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय । अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
एतत्
इन दोनों (अपरा-परा प्रकृति) से
योनीनि
जिनकी उत्पत्ति है
भूतानि
समस्त भूत (प्राणी)
सर्वाणि
सभी
इति
इस प्रकार
उपधारय
समझ
अहम्
मैं
कृत्स्नस्य
सम्पूर्ण
जगतः
जगत का
प्रभवः
उत्पत्ति स्थान
प्रलयः
प्रलय स्थान
तथा
भी।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

समस्त प्राणी इन दोनों (अपरा और परा प्रकृति) से उत्पन्न होते हैं, ऐसा तू समझ। और मैं सम्पूर्ण जगत का उत्पत्ति स्थान तथा प्रलय स्थान भी हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जड़ और चेतन दोनों प्रकृतियाँ भगवान से ही उत्पन्न हैं। वे ही सृष्टि के आदि कारण और संहारकर्ता हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

समस्त प्राणी इन दोनों प्रकृतियों (अपरा और परा) से उत्पन्न होते हैं – ऐसा समझ। और मैं ही सम्पूर्ण जगत का उत्पत्ति स्थान और प्रलय स्थान हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर ही सृष्टि के मूल कारण हैं। सब कुछ उन्हीं से उत्पन्न होता है और अंत में उन्हीं में विलीन हो जाता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 6/30 20% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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