श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 7 (ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga))

अध्याय 7 · श्लोक 5

ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 30 3 मिनट का पठन 129 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

15 पद
अपरा
अपरा (नीची)
इयम्
यह
इतः
इससे
तु
तो
अन्याम्
दूसरी
प्रकृतिम्
प्रकृति को
विद्धि
जान
मे
मेरी
पराम्
परा (श्रेष्ठ)
जीवभूताम्
जीवस्वरूपा
महाबाहो
हे महाबाहो
यया
जिससे
इदम्
यह
धार्यते
धारण किया जाता है
जगत्
जगत।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे महाबाहो! यह (आठ तत्त्वों वाली) मेरी अपरा (नीची) प्रकृति है, परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (श्रेष्ठ) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिससे यह जगत धारण किया जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब कृष्ण अपनी परा (दिव्य) प्रकृति का वर्णन करते हैं – जीवात्मा। जीव ही इस जड़ जगत को चेतनता प्रदान करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे अर्जुन! यह आठ तत्त्वों वाली मेरी अपरा (निम्न) प्रकृति है। परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (उच्च) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जीवात्मा ईश्वर की उच्चतर शक्ति है। वह शरीर और इन्द्रियों से परे है और समस्त जड़ जगत को चेतनता प्रदान करता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 7: ज्ञान विज्ञान योग (Gyan Vigyan Yoga)
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श्लोक 5/30 17% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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