मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदअपरा
अपरा (नीची)
इयम्
यह
इतः
इससे
तु
तो
अन्याम्
दूसरी
प्रकृतिम्
प्रकृति को
विद्धि
जान
मे
मेरी
पराम्
परा (श्रेष्ठ)
जीवभूताम्
जीवस्वरूपा
महाबाहो
हे महाबाहो
यया
जिससे
इदम्
यह
धार्यते
धारण किया जाता है
जगत्
जगत।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे महाबाहो! यह (आठ तत्त्वों वाली) मेरी अपरा (नीची) प्रकृति है, परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (श्रेष्ठ) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिससे यह जगत धारण किया जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
अब कृष्ण अपनी परा (दिव्य) प्रकृति का वर्णन करते हैं – जीवात्मा। जीव ही इस जड़ जगत को चेतनता प्रदान करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे अर्जुन! यह आठ तत्त्वों वाली मेरी अपरा (निम्न) प्रकृति है। परन्तु इससे भिन्न मेरी परा (उच्च) प्रकृति को जानो, जो जीवस्वरूपा है और जिसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
जीवात्मा ईश्वर की उच्चतर शक्ति है। वह शरीर और इन्द्रियों से परे है और समस्त जड़ जगत को चेतनता प्रदान करता है।