मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ ४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदभूमि
पृथ्वी
आपः
जल
अनलः
अग्नि
वायुः
वायु
खम्
आकाश
मनः
मन
बुद्धि
बुद्धि
एव
भी
च
और
अहंकार
अहंकार
इति
इस प्रकार
इयम्
यह
मे
मेरी
भिन्ना
पृथक
प्रकृतिः
प्रकृति
अष्टधा
आठ प्रकार से।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इस प्रकार यह मेरी प्रकृति आठ प्रकार से विभाजित है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
कृष्ण अपनी अपरा (भौतिक) प्रकृति के आठ घटक बताते हैं। ये सभी जड़ तत्त्व हैं और जीव के उपकरण हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इस प्रकार मेरी प्रकृति आठ प्रकार से विभाजित है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह आठ तत्त्व समस्त जड़ जगत का निर्माण करते हैं। ये सब भगवान की शक्ति का विस्तार हैं। उनके अधीन होकर ही कार्य करते हैं।