मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ । जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥ ९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदपुण्यः
पवित्र
गन्धः
गन्ध
पृथिव्याम्
पृथ्वी में
च
और
तेजः
तेज
च
भी
अस्मि
हूँ
विभावसौ
अग्नि में
जीवनम्
जीवन
सर्वभूतेषु
समस्त प्राणियों में
तपः
तप
च
भी
अस्मि
हूँ
तपस्विषु
तपस्वियों में।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं पृथ्वी में पुण्य गन्ध हूँ और अग्नि में तेज हूँ; समस्त प्राणियों में जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ईश्वर का अंश हर जगह है – सुगन्ध, तेज, जीवनशक्ति और तप में।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मैं पृथ्वी की पुण्य सुगन्ध हूँ, अग्नि का तेज हूँ, समस्त प्राणियों का जीवन हूँ, और तपस्वियों का तप हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सभी श्रेष्ठ गुणों और शक्तियों का स्रोत है। सुगन्ध, प्रकाश, जीवन और तप – ये सब उसी की विभूतियाँ हैं।