भक्ति षटक (अध्याय ७-१२) अध्याय ११ · कुल ५५ श्लोक 5 मिनट अध्ययन

विश्वरूप दर्शन योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ११ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

ग्यारहवाँ अध्याय अर्जुन द्वारा भगवान का विश्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त करने से प्रारंभ होता है। कृष्ण अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं और अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैं, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक साथ दिखता है।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ११ (विश्वरूप दर्शन योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

ग्यारहवाँ अध्याय अर्जुन द्वारा भगवान का विश्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त करने से प्रारंभ होता है। कृष्ण अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं और अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैं, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक साथ दिखता है।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / ३)

श्लोक १ - २५
अध्याय ११ · श्लोक १

अर्जुन उवाच । मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् । यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥ १॥

हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: आपने मुझ पर कृपा करके जो परम गोपनीय अध्यात्म-विषयक वचन कहे हैं, उनसे मेरा यह मोह दूर हो गया है।

अध्याय ११ · श्लोक २

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥ २॥

हिंदी अर्थ

हे कमलनेत्र! मैंने आपसे सब प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय तथा आपकी अविनाशी महिमा का विस्तारपूर्वक श्रवण किया है।

अध्याय ११ · श्लोक ३

एवमेतद्यथा त्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥ ३॥

हिंदी अर्थ

हे परमेश्वर! आपने अपने विषय में जैसा कहा है, वह सब सत्य है; फिर भी हे पुरुषोत्तम, मैं आपके ऐश्वर्यमय रूप को देखना चाहता हूँ।

अध्याय ११ · श्लोक ४

मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥ ४॥

हिंदी अर्थ

हे प्रभो! यदि आप यह मानते हैं कि मैं आपके इस रूप को देख सकता हूँ, तो हे योगेश्वर, आप मुझे अपने उस अविनाशी स्वरूप का दर्शन कीजिए।

अध्याय ११ · श्लोक ५

श्रीभगवानुवाच । पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः । नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥ ५॥

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् बोले: हे पार्थ, मेरे उन रूपों को देख, जो सैकड़ों और हजारों की संख्या में हैं, अनेक प्रकार के दिव्य हैं तथा अनेक रंगों और आकृतियों से युक्त हैं।

अध्याय ११ · श्लोक ६

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥ ६॥

हिंदी अर्थ

हे भारत, आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्विनीकुमारों और मरुतों को देख; तथा बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यों को भी देख।

अध्याय ११ · श्लोक ७

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ॥ ७॥

हिंदी अर्थ

हे गुडाकेश, अब तू मेरे इस शरीर में सम्पूर्ण चर-अचर सहित समस्त जगत् को एक साथ देख तथा और भी जो कुछ तू देखना चाहता है, उसे देख।

अध्याय ११ · श्लोक ८

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा । दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥ ८॥

हिंदी अर्थ

परन्तु तू अपनी इन आँखों से मुझे नहीं देख सकता; इसलिए मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ। तू मेरे ऐश्वर्यमय योग को देख।

अध्याय ११ · श्लोक ९

सञ्जय उवाच । एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः । दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥ ९॥

हिंदी अर्थ

संजय बोले: हे राजन्, इस प्रकार कहकर तब महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया।

अध्याय ११ · श्लोक १०

अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥ १०॥

हिंदी अर्थ

उस विराट रूप के अनेक मुख और नेत्र थे, अनेक अद्भुत दृश्य थे, अनेक दिव्य आभूषण थे और अनेक दिव्य शस्त्र उठे हुए थे।

अध्याय ११ · श्लोक ११

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ११॥

हिंदी अर्थ

वह दिव्य मालाओं और वस्त्रों से युक्त, दिव्य गंध और चंदन से विभूषित, सब प्रकार से आश्चर्यमय, अनंत और सब ओर मुख वाला देव था।

अध्याय ११ · श्लोक १२

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता । यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥ १२॥

हिंदी अर्थ

यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हो जाएँ, तो उनकी प्रभा कहीं उस महात्मा (विराट रूप) की प्रभा के समान हो सकती है।

अध्याय ११ · श्लोक १३

तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा । अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥ १३॥

हिंदी अर्थ

तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस देवों के देव (कृष्ण) के शरीर में सम्पूर्ण जगत् को अनेक प्रकार से विभक्त होकर एक स्थान पर स्थित देखा।

अध्याय ११ · श्लोक १४

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः । प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥ १४॥

हिंदी अर्थ

तब आश्चर्यचकित और रोमांचित होकर धनंजय अर्जुन ने भगवान् को सिर झुकाकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले।

अध्याय ११ · श्लोक १५

अर्जुन उवाच । पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् । ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥ १५॥

हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले: हे देव, मैं आपके शरीर में सभी देवताओं को तथा विविध प्राणियों के समूहों को देखता हूँ; ब्रह्मा जी को कमलासन पर स्थित देखता हूँ, तथा सभी ऋषियों और दिव्य सर्पों को देखता हूँ।

अध्याय ११ · श्लोक १६

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् । नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥ १६॥

हिंदी अर्थ

हे विश्वेश्वर, हे विश्वरूप, मैं आपको अनेक भुजाओं, उदरों, मुखों और नेत्रों से युक्त, सब ओर अनंत रूप धारण किए हुए देखता हूँ। मैं आपका न अंत देखता हूँ, न मध्य और न ही आदि।

अध्याय ११ · श्लोक १७

किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥ १७॥

हिंदी अर्थ

मैं आपको मुकुट धारण किए, गदा और चक्र धारण किए, तेज के ढेर के रूप में सब ओर दीप्तिमान देखता हूँ। आप चारों ओर से दुर्निरीक्ष्य हैं, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के समान कांति वाले और अप्रमेय हैं।

अध्याय ११ · श्लोक १८

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥ १८॥

हिंदी अर्थ

आप परम अक्षर (अविनाशी) हैं और जानने योग्य हैं; आप इस विश्व के परम आधार हैं; आप अविनाशी तथा सनातन धर्म के रक्षक हैं; आप सनातन पुरुष हैं – ऐसा मैं मानता हूँ।

अध्याय ११ · श्लोक १९

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् । पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥ १९॥

हिंदी अर्थ

मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत पराक्रम वाले, अनंत भुजाओं वाले, चंद्र और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले तथा अपने तेज से इस सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देखता हूँ।

अध्याय ११ · श्लोक २०

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः । दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥ २०॥

हिंदी अर्थ

हे महात्मन्, स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह सम्पूर्ण अंतरिक्ष तथा सभी दिशाएँ आपके द्वारा ही व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत एवं उग्र रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।

अध्याय ११ · श्लोक २१

अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥ २१॥

हिंदी अर्थ

ये देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं; कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति कर रहे हैं; तथा महर्षियों और सिद्धों के समूह "कल्याण हो" कहकर अनेक प्रकार की स्तुतियों से आपकी स्तुति करते हैं।

अध्याय ११ · श्लोक २२

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥ २२॥

हिंदी अर्थ

रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुत्, उष्मप (पितर), तथा गन्धर्व, यक्ष, असुर और सिद्धों के समूह – सभी आपको आश्चर्य से देख रहे हैं।

अध्याय ११ · श्लोक २३

रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् । बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥ २३॥

हिंदी अर्थ

हे महाबाहो, आपके इस महान् रूप को, जिसमें अनेक मुख और नेत्र हैं, अनेक भुजाएँ, जंघाएँ और पैर हैं, अनेक उदर हैं, और अनेक दाढ़ों से विकराल है, देखकर सभी लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हूँ।

अध्याय ११ · श्लोक २४

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् । दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥ २४॥

हिंदी अर्थ

हे विष्णो, आपको आकाश को स्पर्श करते हुए, दीप्त, अनेक रंगों वाले, फैले हुए मुख वाले तथा दीप्त और विशाल नेत्रों वाले देखकर मेरी अंतरात्मा व्याकुल हो रही है और मुझे न धैर्य मिलता है, न शांति।

अध्याय ११ · श्लोक २५

दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥ २५॥

हिंदी अर्थ

आपके उन मुखों को, जो दाढ़ों से विकराल हैं और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रतीत होते हैं, देखकर मुझे दिशाओं का भी ज्ञान नहीं रहा और मुझे शांति नहीं मिलती। हे देवेश, हे जगन्निवास, प्रसन्न हों।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
विश्वरूप दर्शन योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
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यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

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