अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१॥
अर्जुन बोले: हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर मैं अब सचेत हुआ और अपने स्वाभाविक अवस्था में आ गया हूँ।
श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय ११ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या
ग्यारहवाँ अध्याय अर्जुन द्वारा भगवान का विश्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त करने से प्रारंभ होता है। कृष्ण अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं और अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैं, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक साथ दिखता है।
श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय ११ (विश्वरूप दर्शन योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।
ग्यारहवाँ अध्याय अर्जुन द्वारा भगवान का विश्वरूप देखने की इच्छा व्यक्त करने से प्रारंभ होता है। कृष्ण अर्जुन को दिव्य चक्षु प्रदान करते हैं और अपने विराट रूप का दर्शन कराते हैं, जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक साथ दिखता है।
मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ ३ / ३)
अर्जुन उवाच । दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥ ५१॥
अर्जुन बोले: हे जनार्दन, आपके इस सौम्य मानव रूप को देखकर मैं अब सचेत हुआ और अपने स्वाभाविक अवस्था में आ गया हूँ।
श्रीभगवानुवाच । सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२॥
श्रीभगवान् बोले: मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा इच्छुक रहते हैं।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३॥
न तो वेदों से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से ही मैं इस रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसे तुमने मुझे देखा।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ॥ ५४॥
परन्तु हे अर्जुन, अनन्य भक्ति से ही मैं इस रूप में तत्त्व से जाना, देखा और प्राप्त किया जा सकता हूँ, हे परन्तप।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५॥
हे पाण्डव, जो पुरुष मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे परम मानने वाला, मेरा भक्त, आसक्ति रहित और सम्पूर्ण प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह मुझको प्राप्त होता है।
वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।
संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।