मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥ ५३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदन
नहीं
अहम्
मैं
वेदैः
वेदों से
न
नहीं
तपसा
तप से
न
नहीं
दानेन
दान से
न
नहीं
च
और
इज्यया
पूजा से
शक्य
संभव
एवंविधः
इस प्रकार का
द्रष्टुम्
देखना
दृष्टवान्
देखा
असि
तुमने
माम्
मुझे
यथा
जैसे।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
न तो वेदों से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से ही मैं इस रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसे तुमने मुझे देखा।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् पुनः इस रूप की दुर्लभता पर बल देते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
न तो वेदों से, न तप से, न दान से, और न यज्ञ से ही मैं इस रूप में देखा जा सकता हूँ, जैसे तुमने मुझे देखा।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के दर्शन केवल उनकी कृपा से होते हैं, साधनों से नहीं।