मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रीभगवानुवाच । सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥ ५२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदश्रीभगवान्
भगवान्
उवाच
बोले
सुदुर्दर्शम्
अत्यंत दुर्लभ
इदम्
यह
रूपम्
रूप
दृष्टवान्
देखा
असि
तुमने
यत्
जो
मम
मेरा
देवा
देवता
अपि
भी
अस्य
इस
रूपस्य
रूप के
नित्यम्
नित्य
दर्शनकाङ्क्षिणः
दर्शन के इच्छुक।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
श्रीभगवान् बोले: मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा इच्छुक रहते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान् चतुर्भुज रूप की दुर्लभता बताते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मेरा यह रूप जो तुमने देखा है, अत्यंत दुर्लभ है। देवता भी इस रूप के दर्शन के लिए सदा इच्छुक रहते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान् के सगुण रूप के दर्शन दुर्लभ हैं, यह भक्त की विशेष कृपा है।