मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः । निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥ ५५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदमत्कर्मकृत्
मेरे लिए कर्म करने वाला
मत्परमः
मुझे परम मानने वाला
मद्भक्तः
मेरा भक्त
सङ्गवर्जितः
संग रहित
निर्वैरः
वैर रहित
सर्वभूतेषु
सभी प्राणियों में
यः
जो
सः
वह
माम्
मुझे
एति
प्राप्त होता है
पाण्डव
हे पाण्डव।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पाण्डव, जो पुरुष मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे परम मानने वाला, मेरा भक्त, आसक्ति रहित और सम्पूर्ण प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह मुझको प्राप्त होता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक गीता के सार रूप में भक्ति का मार्ग बताता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पाण्डव, जो पुरुष मेरे लिए कर्म करने वाला, मुझे परम मानने वाला, मेरा भक्त, आसक्ति रहित और सम्पूर्ण प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह मुझको प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह श्लोक भक्ति योग का सार है – भगवत्समर्पण, अनन्य भक्ति, और सबसे प्रेम।