ज्ञान षटक (अध्याय १३-१८) अध्याय १६ · कुल २४ श्लोक 5 मिनट अध्ययन

दैवासुर संपद्विभाग योग

श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय १६ सम्पूर्ण श्लोक, अन्वय एवं हिंदी व्याख्या

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति बंधन का कारण।

अध्याय का विस्तृत सार एवं रहस्य
संपादकीय रूप से तैयार सामग्री · अंतिम समीक्षा: 25 फरवरी, 2026
पावन परिचय

१. अध्याय सार एवं आध्यात्मिक महत्व

श्रीमद्भगवद्गीता के इस अध्याय १६ (दैवासुर संपद्विभाग योग) में भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के मध्य घटित संवाद मानवीय चेतना के गूढ़ रहस्यों, जीवन के द्वंद्वों और कर्तव्य पथ पर मार्गदर्शन प्रदान करता है।

सोलहवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी (दिव्य) और आसुरी (राक्षसी) प्रवृत्तियों का वर्णन करते हैं। वह बताते हैं कि दैवी संपत्ति मुक्ति देने वाली है और आसुरी संपत्ति बंधन का कारण।

२. अध्याय के पावन श्लोक

मूल संस्कृत श्लोक, अन्वय एवं प्रामाणिक हिंदी अनुवाद (पृष्ठ १ / १)

श्लोक १ - २४
अध्याय १६ · श्लोक १

श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थिति: | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् || १||

हिंदी अर्थ

श्रीभगवान् बोले: निर्भयता, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में स्थिति, दान, इन्द्रिय-दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और सरलता — ये सब दैवी सम्पदा के लक्षण हैं।

अध्याय १६ · श्लोक २

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् || २||

हिंदी अर्थ

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोलुपता न होना, कोमलता, लज्जा और चपलता का अभाव — ये भी दैवी गुण हैं।

अध्याय १६ · श्लोक ३

तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत || ३||

हिंदी अर्थ

हे भारत! तेज, क्षमा, धैर्य, शुद्धि, द्रोह न करना और अभिमान का न होना — ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

अध्याय १६ · श्लोक ४

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोध: पारुष्यमेव च | अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् || ४||

हिंदी अर्थ

हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता और अज्ञान — ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।

अध्याय १६ · श्लोक ५

दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता | मा शुच: सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव || ५||

हिंदी अर्थ

दैवी सम्पदा मोक्ष के लिए और आसुरी सम्पदा बन्धन के लिए मानी गई है। हे पाण्डव! तुम शोक मत करो, तुम दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए हो।

अध्याय १६ · श्लोक ६

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च | दैवो विस्तरश: प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु || ६||

हिंदी अर्थ

इस लोक में प्राणियों की दो सृष्टियाँ हैं – दैवी और आसुरी। दैवी का तो विस्तार से वर्णन किया गया; हे पार्थ! अब आसुरी सम्पदा को मुझसे सुनो।

अध्याय १६ · श्लोक ७

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुरा: | न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते || ७||

हिंदी अर्थ

आसुरी प्रकृति के लोग न तो प्रवृत्ति (कर्तव्य) को जानते हैं और न निवृत्ति (त्याग) को। उनमें न शुद्धि है, न सदाचार, न सत्य।

अध्याय १६ · श्लोक ८

असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् || ८||

हिंदी अर्थ

वे कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, आधारहीन है, ईश्वररहित है, और केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है – काम ही इसका कारण है।

अध्याय १६ · श्लोक ९

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धय: | प्रभवन्त्युग्रकर्माण: क्षयाय जगतोऽहिता: || ९||

हिंदी अर्थ

इस दृष्टिकोण को धारण करके वे नष्ट हुई आत्मा वाले अल्पबुद्धि लोग उग्र कर्म करने वाले, जगत् के अहितकारी और नाश के लिए उत्पन्न होते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक १०

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विता: | मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रता: || १०||

हिंदी अर्थ

दुष्पूर कामना का आश्रय लेकर, दम्भ, मान और मद से युक्त होकर, मोह के कारण असत्य को ग्रहण करके वे अपवित्र व्रतों का पालन करने वाले होते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक ११

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिता: | कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिता: || ११||

हिंदी अर्थ

वे मृत्यु पर्यन्त रहने वाली असीम चिन्ता का आश्रय लिए रहते हैं, काम-भोग को ही परम मानते हैं और "बस यही सब कुछ है" – ऐसा निश्चय कर लेते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक १२

आशापाशशतैर्बद्धा: कामक्रोधपरायणा: | ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् || १२||

हिंदी अर्थ

आशा रूपी सैंकड़ों फन्दों से बंधे हुए, काम-क्रोध में लगे हुए, वे भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धन का संचय करना चाहते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक १३

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् | इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् || १३||

हिंदी अर्थ

मैंने आज यह प्राप्त कर लिया, अब उस मनोरथ को प्राप्त करूँगा। यह धन मेरे पास है, और यह भी मुझे भविष्य में मिलेगा।

अध्याय १६ · श्लोक १४

असौ मया हत: शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि | ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी || १४||

हिंदी अर्थ

वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया, और दूसरों को भी मारूँगा। मैं ईश्वर हूँ, मैं भोगी हूँ, मैं सिद्ध हूँ, बलवान् हूँ और सुखी हूँ।

अध्याय १६ · श्लोक १५

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया | यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिता: || १५||

हिंदी अर्थ

मैं धनी और कुलीन हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, आनन्द मनाऊँगा – इस प्रकार वे अज्ञान से मोहित रहते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक १६

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृता: | प्रसक्ता: कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ || १६||

हिंदी अर्थ

अनेक प्रकार की चित्तवृत्तियों से भ्रमित, मोह के जाल से घिरे हुए, काम-भोगों में अत्यधिक आसक्त होकर वे अपवित्र नरक में गिरते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक १७

आत्मसम्भाविता: स्तब्धा धनमानमदान्विता: | यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् || १७||

हिंदी अर्थ

आत्म-प्रशंसक, अकड़ने वाले, धन और मान के मद से युक्त, वे केवल नाम के यज्ञों को दम्भ से करते हैं, विधि के अनुसार नहीं।

अध्याय १६ · श्लोक १८

अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिता: | मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयका: || १८||

हिंदी अर्थ

अहंकार, बल, घमण्ड, काम और क्रोध का आश्रय लेकर, वे मुझ परमात्मा को, जो अपने और दूसरों के शरीरों में स्थित हूँ, द्वेष करते हैं तथा ईर्ष्या करते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक १९

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान् | क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु || १९||

हिंदी अर्थ

उन द्वेष करने वाले क्रूर, नराधम, अशुभ लोगों को मैं बारम्बार संसार में आसुरी योनियों में ही डालता हूँ।

अध्याय १६ · श्लोक २०

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि | मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् || २०||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! वे मूढ़ जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होकर मुझे नहीं पाते, और तदनन्तर उससे भी अधम गति को चले जाते हैं।

अध्याय १६ · श्लोक २१

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: | काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् || २१||

हिंदी अर्थ

यह तीन प्रकार का नरक का द्वार आत्मा का नाश करने वाला है – काम, क्रोध और लोभ। इसलिए इन तीनों को त्याग देना चाहिए।

अध्याय १६ · श्लोक २२

एतैर्विमुक्त: कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नर: | आचरत्यात्मन: श्रेयस्ततो याति परां गतिम् || २२||

हिंदी अर्थ

हे कौन्तेय! जो मनुष्य इन तीन अन्धकार के द्वारों से मुक्त हो जाता है, वह अपने कल्याण का आचरण करता है और तत्पश्चात परम गति को प्राप्त होता है।

अध्याय १६ · श्लोक २३

य: शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारत: | न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् || २३||

हिंदी अर्थ

जो शास्त्रविधि को त्यागकर मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि पाता है, न सुख, न परम गति।

अध्याय १६ · श्लोक २४

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ | ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि || २४||

हिंदी अर्थ

इसलिए कर्तव्य और अकर्तव्य के निर्णय में शास्त्र ही तेरा प्रमाण है। शास्त्रविधि द्वारा कहे हुए कर्म को जानकर ही तू यहाँ (इस लोक में) करने योग्य है।

शोध एवं संपादन
श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और सनातन दर्शन के अध्येता। गीता के पावन श्लोकों और अन्वयों का संदर्भ-आधारित प्रस्तुतीकरण।

संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत साहित्य एवं सनातन शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक मंच पर प्रकाशित समस्त श्लोकों के शुद्धता समीक्षक।

विशेष आध्यात्मिक अनुभाग
दैवासुर संपद्विभाग योग का विस्तृत सार

इस अध्याय के गूढ़ दार्शनिक रहस्यों, व्यावहारिक जीवन में इसके उपयोग और गहन विवेचन को पढ़ें।

विस्तृत व्याख्या पढ़ें

गीता के तीन षटक

१. कर्म षटक अध्याय १-६
निष्काम कर्म, आत्मा की अमरता एवं ध्यान योग की साधना।
२. भक्ति षटक अध्याय ७-१२
ईश्वर का दिव्य ऐश्वर्य, विश्वरूप दर्शन एवं अनन्य शरणागति।
३. ज्ञान षटक अध्याय १३-१८
प्रकृति-पुरुष का विवेक, त्रिगुण रहस्य एवं परम मोक्ष संन्यास।
सम्पूर्ण गीता इंडेक्स

श्रीमद्भगवद्गीता के सभी १८ अध्यायों का संकलन एवं श्लोक खोजें।

गीता मुख्य पृष्ठ

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ।।

सफलतापूर्वक कॉपी किया गया!