मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् | अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम् || ८||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदअसत्यम्
असत्य
अप्रतिष्ठम्
आधारहीन
ते
वे
जगत्
जगत्
आहु
कहते हैं
अनीश्वरम्
ईश्वररहित
अपरस्परसम्भूतम्
परस्पर संयोग से उत्पन्न
किम्
क्या
अन्यत्
अन्य
कामहैतुकम्
कामना ही जिसका कारण है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वे कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, आधारहीन है, ईश्वररहित है, और केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है – काम ही इसका कारण है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
आसुरी लोग भौतिकवादी दृष्टिकोण रखते हैं। वे ईश्वर को नकारते हैं और जगत् को आकस्मिक या केवल कामजन्य मानते हैं। यह नास्तिकता का चरम रूप है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
आसुरी प्रकृति के लोग कहते हैं कि यह जगत् असत्य है, बिना आधार का है, ईश्वर से रहित है, और केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न हुआ है – काम ही इसका एकमात्र कारण है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
यह नास्तिकतापूर्ण दृष्टिकोण मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। वास्तविकता यह है कि ईश्वर ही सृष्टि का कर्ता है और जगत् सत्य है।